- थार जैसे विश्वप्रसिद्ध रेगिस्तान से लगा और परकोटों से घिरा हुआ राजस्थान की राजधानी जयपुर
- 1728 ईसवी मे कछवाहा नरेश जयसिंह द्वितीय द्वारा स्थापित महलों और विश्व की सबसे बड़ी तोप का शहर जयपुर
- समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध जयपुर
- अपनी व्यवस्थित बसावट के लिए प्रसिद्ध गुलाबी आभा से दमकता गुलाबी शहर जयपुर
- राजस्थान के कछवाहा वंश के राजपूताने साम्राज्य की गौरवगाथा कहता जयपुर....
- और मेहमानों के स्वागत सत्कार के लिए “पधारो म्हारे देस” गाता हुआ आत्मीय शहर जयपुर....
अपने आप मे अनुपम इस शहर को इस बार चुना गया वैशाली महानगर के स्वयंसेवकों के दो दिन के भ्रमण के लिए। योजना के अनुसार दो दिन का प्रवास तय किया गया जिसे जयपुर के वैशाली नगर के स्वयंसेवकों द्वारा व्यवस्थित किया जाना था। स्वयंसेवकों के व्यक्तिगत सहभागिता से टिकटें आरक्षित कर ली गईं परन्तु दिनांक 17-03-12 को सुबह चार बजे की ट्रेन के समय स्टेशन पहुँचने की समस्या सामने थी... अंतिम दिन यह तय हुआ कि किसी असुविधा से बचने के लिए एक बस बुक कर ली जाय जिससे सुबह सब आराम से एक साथ दिल्ली स्टेशन पहुँच सकें।
16-17 की रात को हम एक स्थान पर एकत्रित हुए। सब मे जबर्दस्त उत्साह और उमंग थी इस भ्रमण कार्यक्रम के लिए। सुबह तीन बजे जब बस से दिल्ली स्टेशन के लिए प्रस्थान हुआ तो बस "वंदे मातरम" और "भारत माता की जय" के जयघोषों से वातावरण उमंग से भर उठा।
दिल्ली से सुबह साढ़े चार बजे की ट्रेन जयपुर की ओर तीव्र गति से बढ़ रही थी और ट्रेन की बोगियाँ राष्ट्र भक्ति के गीतों, कविताओं और भजनों से गुंजायमान हो रही थीं… हरीश चौहान जी की ओजमयी वीर रस की कविताओं और राजेश्वर जी के राष्ट्रभक्ति के गीतों को सुन कर सहयात्रियों का भी राष्ट्र प्रेम उमड़ पड़ा और वो लोग भी साथ मिल कर गाने गुनगुनाने लगे। सुबह के दस बजे तक ट्रेन अरावली पर्वत शृंखलाओं के साए मे चलती हुई गुलाबी शहर जयपुर के स्टेशन पर पहुँच चुकी थी।
राजस्थान शहर अपनी स्वागत परंपरा के लिए भी प्रसिद्ध रही है... स्टेशन पर जयपुर के वैशाली नगर से विवेक जी और उनके साथ अन्य स्वयंसेवक हमारे स्वागत मे बस के साथ उपस्थित थे। समय कम था, इस लिए तय हुआ कि हम सीधे घूमने ही निकलेंगे। भोजन आदि रास्ते मे ही होना तय हुआ। बस से जयपुर की सड़कों पर निकलते ही उसके स्थापत्य के दर्शन होने लगे। जहां बोगनवेलिया की लताएँ जयपुर को और भी गुलाबी करने को उतावली थीं, वहीं जगह जगह पर राजस्थानी शैली के भित्ति चित्रों ने मन मोहने मे कोई कसर नहीं छोड़ी। हम चलते हुए जयपुर के स्थापत्य के अनुपम उदाहरण हवामहल के सामने से निकलते हुए चारों तरफ से झील के पानी से घिरे हुए जलमहल की छटा निहारते हुए ..... किले की ओर बढ़ गए। तय हुआ कि इन्हें वापसी के समय देखा जाएगा। मार्च का महीना होने के कारण पतझड़ का प्रकोप जयपुर के पहाड़ों पर साफ दिख रहा था। पेड़ों से पत्तियाँ झड़ चुकी थीं और गर्मी भी हो रही थी परन्तु पहाड़ों पर चारों ओर फैले परकोटों और बुर्जों की कतारें सबका मन मोह रही थीं। शहर की भव्यता पहाड़ों की ऊंचाइयों से और निखर कर आ रहा था। लगभग एक घंटे मे हम नाहरगढ़ किले पर थे...
नाहर गढ़ या शेरगढ़- हम पहाड़ों पर टेढ़ी मेढ़ी सड़कों पर चढ़ते हुए नाहरगढ़ पहुँच चुके थे। इसे शेरगढ़ का महल भी कहा जाता है। आरावली की पर्वत श्रृंखला के कोर (edge) पर आमेर की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस किले को सवाई राजा जैसिंह द्वितीय ने सन १७३४ में बनवाया था. इसके अंतःपुर सुन्दर मेहराबदार दरवाजों और सुन्दर कली बूटों की चित्रकारी से सुसज्जित हैं। अत्यंत चिकने फर्श और हवादार खिड़कियों से युक्त सुन्दर महल अभी तक सुरक्षित है। यहाँ एक किंवदंती है कि कोई एक नाहर सिंह नामके राजपूत की प्रेतात्मा वहां भटका करती थी. किले के निर्माण में व्यावधान भी उपस्थित किया करती थी. अतः तांत्रिकों से सलाह ली गयी और उस किले को उस प्रेतात्मा के नाम पर नाहरगढ़ रखने से प्रेतबाधा दूर हो गयी थी. १९ वीं शताब्दी में सवाई राम सिंह और सवाई माधो सिंह के द्वारा भी किले के अन्दर भवनों का निर्माण कराया गया था जिनकी हालत ठीक ठाक है जब कि पुराने निर्माण जीर्ण शीर्ण हो चले हैं. यहाँ के राजा सवाई राम सिंह के नौ रानियों के लिए अलग अलग आवास खंड बनवाए गए हैं जो सबसे सुन्दर भी हैं. इनमे शौच आदि के लिए आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था की गयी थी। वहाँ से निकालने के बाद हमें दो किले और देखने थे। जबकि कई लोग इस किले मे घूमते हुए थक चुके थे। हमारी बस अगले किले के लिए निकल चुकी थी।
जयगढ़ का किला- नाहर गढ़ से चल कर हम जयगढ़ पहुंचे तो धूप और गर्मी अपने चरम पर थी... हमने फिर भी किला देखने का मन बनाया जबकि कुछ मित्रों ने बस मे ही आराम करने का निश्चय किया। जयगढ़ दुर्ग दुनिया की सबसे बड़ी प्राचीन तोप के लिए भी प्रसिद्ध है जिसका भार लगभग 250 टन है। इसके अतिरिक्त इस किले का स्थापत्य जलापूर्ति की व्यवस्था, शस्त्रागार, बौर लगे आम के पेड़ों की मदमस्त महक, कठपुतली का मोहक नृत्य और सुन्दर अंतःपुर अनायास ही मन मोह लेते हैं।
आमेर (आम्बेर) का किला- जयगढ़ के किले के पीछे की पहाड़ी पर एक भव्य और विशाल महल आमेर का किला कहलाता है। यह किला चारों तरफ की पहाड़ियों पर बने परकोटों और बुर्जों से घिरा हुआ है। यहाँ सुंदर झील और उद्यानों के बीच से किले के लिए ऊपर जाती सीढ़ियाँ हैं जहाँ एक विशाल प्रांगण इस महल की भव्यता को पहली दृष्टि मे उजागर करता है... उसके ऊपर सीढ़ियों से चढ़ कर अत्यन्त मनोहारी भित्तिचित्रों और शीशे की पच्चीकारी से सुसज्जित महल के अंतःपुर हैं जो राजस्थान के वैभवशाली इतिहास के साक्षी हैं।
आमेर के किले को देखते देखते शाम हो चुकी थी... हम वहाँ से निकल कर जलमहल पहुंचे जहाँ अनुरक्षण कार्य होने के कारण प्रवेश बंद था। परन्तु जलमहल की छटा बाहर से ही दर्शनीय थी। थोड़ी देर वहाँ रुक कर हम सब जयपुर के प्रसिद्ध कृष्ण मन्दिर पहुंचे जहाँ आरती के और झांझ मँजीरे के साथ कीर्तन का रसास्वादन किया और परिक्रमा की... रात ढल रही थी... रात के भोजन के लिए परिवारों से लोग हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। मन्दिर से निकल कर हम सीधे भारतीय किसान संघ भवन पहुंचे, जहाँ हमारे रात्रि विश्राम की व्यवस्था थी । पूरे दिन मे वैशाली नगर के शारीरिक प्रमुख हिमांशु जी हमारे साथ ही रहे और हमें जयपुर से अवगत कराते रहे। वहाँ से तमाम परिवारों मे जा कर परिवारों का आतिथ्य और जयपुर के सादिष्ट भोजनों का आनंद मिला। देर रात तक की भाग दौड़ मे सब थक चुके थे और लेटते ही निद्रा देवी ने सबको अपने अंक मे भर लिया।
18 मार्च 2012 की सुबह एक और अविस्मरणीय समय लेकर आई जब वैशाली महानगर गाजियाबाद और वैशाली नगर जयपुर के स्वयंसेवकों के आपसी मिलन का समय आया। सात बजे एक सुन्दर पार्क मे एक साथ सबका ध्वजप्रणाम हुआ और फिर खेल, बौद्धिक,और उत्साहवर्धक राष्ट्रभक्ति के गीतों से पूरा पार्क राष्ट्रमय हो गया। जयपुर से बौद्धिक प्रमुख प्रोफेसर जी का बौद्धिक अविस्मरणीय, और हृदयंगम करने वाला रहा...
दोपहर हो चुकी थी... जयपुर मे इस दोपहर को राजस्थान का स्थानीय और प्रसिद्ध व्यंजन दाल, बाटी, चूरमा ने सबका मन मोह गया। दाल, राजस्थान की कढ़ी, बाटी, मसाला बाटी, चूरमा, बेसन का चूरमा, चावल और पापड़ आदि के साथ दिव्य भोजन ने राजस्थान प्रवास को यादगार बना दिया। भोजन करने के बाद हमने परित्यक्त बच्चों को पालने वाली संस्था(यद्यपि संस्था कहना अनुचित है) को देखने के लिए भी गए और यह समय जयपुर प्रवास का एक और अविस्मरणीय समय बना...सुरमन पालना नाम की इस संस्था मे तमाम अनाथ और परित्यक्त बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं...उन्हें देखना समझना वैचारिक और भावनात्मक उद्वेलन के लिए ऊर्जा का कार्य करता है... कुछ समय के लिए हम जयपुर के बाज़ारों की ओर भी निकले। रविवार होने के कारण यद्यपि प्रायः बाज़ार बंद थे परन्तु हमने अपनी आवश्यकतानुसार ख़रीदारी की...
वापस आकर पता लगा अब वापसी की वेला भी आने वाली है... आपस मे परिचय का और वार्ता का दौर भी चला...परिचय होते होते ट्रेन का समय समीप आ चुका था... हमने अपने जयपुर मित्रों से भावभीनी विदाई ली और बस से स्टेशन आ गये बीच मे हम संघ कार्यालय को देखने का लोभ संवरण नहीं कर सके स्टेशन पहुँचने के बाद पीछे से फोन आया कि आप सबके लिए रास्ते का नाश्ता भेज रहे हैं॥ ट्रेन आने से पहले नाश्ता भी आ चुका था। ट्रेन अपने समय पर आई... हमें अपनी सीटें भले न मिली हों पर जयपुर मे हमें जो सम्मान, आत्मीयता और अपनत्व का जो माहौल मिला उसे दिलों मे सजाए हुए हम गाते गुनगुनाते जयपुर को पीछे छोडते जा रहे थे...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
अपने विचार यहाँ लिखें --