वैशाली महानगर गाजियाबाद के सायं शाखाओं के विद्यार्थियों के लिए दो दिवसीय वनविहार का कार्यक्रम रखा गया। इस वनविहार के लिए गढ़मुक्तेश्वर, हस्तिनापुर, और मेरठ स्थिति महाकाल मन्दिर की यात्रा की योजना रखी गयी। यह प्रवास दसवीं कक्षा और नीचे के बच्चों के लिए विशेष रूप से रखा गया था। लगभग 70 बच्चों के साथ बस द्वारा दिनांक 31-03-2012 को हम हापुड़ के लिए निकले जहां हापुड़ की सायं शाखा के साथ खेल कूद और अल्पाहार की व्यवस्था थी। बच्चों के खेल, कबड्डी के साथ राजेश्वर जी के गीतों पर भी बच्चे खूब झूमे... शाखा के बाद अल्पाहार... और फिर बस से गढ़ मुक्तेश्वर के लिए चल पड़े... गढ़ मे विद्यालय मे वहाँ के स्वयं सेवकों ने हमारे रुकने और भोजन की अच्छी व्यवस्था कर रखी थी... भोजन आदि करने के बाद सभी सोने चले गए... सुबह पौ फटने से पहले ही हम गीत गाते हुए गंगा तट की ओर बढ़े.... भारत माता की जय। वन्देमातरम से गंगा जी का तट गूँज उठा... शाखा और व्यायाम के बाद सभी बच्चों ने खूब खुश होकर गंगास्नान का आनंद लिया... गंगास्नान से आते ही विद्यालय मे अल्पाहार की व्यवस्था थी। अल्पाहार के बाद आगे की योजनानुसार हम बस द्वारा मेरठ जिले के प्राचीन और ऐतिहासिक नगर हस्तीनपुर गए।
महाभारतकालीन महानगरों की श्रेणी में हस्तिनापुर भी आता था। इसकी स्थापना हस्तिन् नामक व्यक्ति द्वारा की गई थी। इसीलिये इसे हस्तिनापुर कहा जाता था। हस्तिनापुर कौरवों और पांडवों की राजधानी थी। इसका महाभारत में वर्णित अनेक घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी सारी घटनाएँ हस्तिनापुर में ही हुई थीं। अभी भी यहाँ महाभारत काल से जुड़े कुछ अवशेष मौजूद हैं। इनमें कौरवों-पांडवों के महलों और मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं। इसके अलावा हस्तिनापुर को चक्रवर्ती सम्राट भरत की भी राजधानी माना जाता है। यहाँ स्थित पांडेश्वर महादेव मंदिर की काफ़ी मान्यता है। कहा जाता है यह वही मंदिर है, जहाँ पांडवों की रानी द्रौपदी पूजा के लिए जाया करती थी। पौराणिक काल में हस्तिनापुर के राजा का नाम अधिसीम कृष्ण था। पुराणों में कहा गया है कि जब गंगा की बाढ़ के कारण यह पुर विनष्ट हो गया, उस समय पाण्डव हस्तिनापुर को छोड़ कर कौशाम्बी चले आये थे। यह घटना झूठी नहीं मानी जा सकती। हस्तिनापुर और कौशाम्बी में जो खुदाइयाँ हाल में हुई हैं, उनसे इसकी पुष्टि हो चुकी है जैन समुदाय के बीच हस्तिनापुर को एक प्रमुख तीर्थ माना जाता है।
हस्तिनापुर जैन धर्मावलंबियों का भी प्रसिद्ध तीर्थ है। यहाँ जैन धर्म के कई तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। यही वजह है कि यहाँ काफ़ी संख्या में जैन मंदिर मौजूद हैं। यहीं पर राजा श्रेयांस ने आदितीर्थकर ऋषभदेव को ईख के रस का दान दिया था। इसलिए इसको 'दानतीर्थ' कहते हैं। इसका संबंध शांतिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ नामक तीर्थकरों से भी है। यहाँ अनेक जैन धर्मशालाएं और मंदिर हैं। खुदाई में यहाँ अनेक प्राचीन खंडहर मिले हैं। इनमें क़रीब 200 साल पुराना बड़ा मंदिर, जंबूद्वीप, कैलाश पर्वत, अष्टापद जी, कमल मंदिर और ध्यान मंदिर मुख्य हैं। प्राचीन बड़ा मंदिर में हस्तिनापुर की नहर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई जिन प्रतिमाओं को देखा जा सकता है। इन मंदिरों को काफ़ी सुंदर और कलात्मक तरीक़े से बनाया गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ सिखों का भी पवित्र स्थान है यहाँ पाँच प्यारों मे से एक भाई धर्मदास की जन्म स्थली है। हस्तिनापुर घूम कर बच्चे बहुत प्रसन्न हुए॥
दोपहर हो चुकी थी... वहाँ से बस से निकल कर हम मेरठ आए जहां सबके लिए भोजन की व्यवस्था थी। भोजन करने के बाद बच्चों को एक घंटे के लिए आराम करने का समय दिया गया। मेरठ मे प्रसिद्ध औघड़नाथ शिव मन्दिर जो आज़ादी की प्रथम लड़ाई का गवाह भी है के दर्शन करते हुए वापसी की
मेरठ मे बस खराब हो जाने के कारण दूसरी बस की व्यवस्था कर के हम तय समय से दो घंटे विलम्ब से गाजियाबाद आ गए और यात्रा की स्मृतियाँ सँजोए बच्चे अपने घर चले गए।
महाभारतकालीन महानगरों की श्रेणी में हस्तिनापुर भी आता था। इसकी स्थापना हस्तिन् नामक व्यक्ति द्वारा की गई थी। इसीलिये इसे हस्तिनापुर कहा जाता था। हस्तिनापुर कौरवों और पांडवों की राजधानी थी। इसका महाभारत में वर्णित अनेक घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी सारी घटनाएँ हस्तिनापुर में ही हुई थीं। अभी भी यहाँ महाभारत काल से जुड़े कुछ अवशेष मौजूद हैं। इनमें कौरवों-पांडवों के महलों और मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं। इसके अलावा हस्तिनापुर को चक्रवर्ती सम्राट भरत की भी राजधानी माना जाता है। यहाँ स्थित पांडेश्वर महादेव मंदिर की काफ़ी मान्यता है। कहा जाता है यह वही मंदिर है, जहाँ पांडवों की रानी द्रौपदी पूजा के लिए जाया करती थी। पौराणिक काल में हस्तिनापुर के राजा का नाम अधिसीम कृष्ण था। पुराणों में कहा गया है कि जब गंगा की बाढ़ के कारण यह पुर विनष्ट हो गया, उस समय पाण्डव हस्तिनापुर को छोड़ कर कौशाम्बी चले आये थे। यह घटना झूठी नहीं मानी जा सकती। हस्तिनापुर और कौशाम्बी में जो खुदाइयाँ हाल में हुई हैं, उनसे इसकी पुष्टि हो चुकी है जैन समुदाय के बीच हस्तिनापुर को एक प्रमुख तीर्थ माना जाता है।
हस्तिनापुर जैन धर्मावलंबियों का भी प्रसिद्ध तीर्थ है। यहाँ जैन धर्म के कई तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। यही वजह है कि यहाँ काफ़ी संख्या में जैन मंदिर मौजूद हैं। यहीं पर राजा श्रेयांस ने आदितीर्थकर ऋषभदेव को ईख के रस का दान दिया था। इसलिए इसको 'दानतीर्थ' कहते हैं। इसका संबंध शांतिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ नामक तीर्थकरों से भी है। यहाँ अनेक जैन धर्मशालाएं और मंदिर हैं। खुदाई में यहाँ अनेक प्राचीन खंडहर मिले हैं। इनमें क़रीब 200 साल पुराना बड़ा मंदिर, जंबूद्वीप, कैलाश पर्वत, अष्टापद जी, कमल मंदिर और ध्यान मंदिर मुख्य हैं। प्राचीन बड़ा मंदिर में हस्तिनापुर की नहर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई जिन प्रतिमाओं को देखा जा सकता है। इन मंदिरों को काफ़ी सुंदर और कलात्मक तरीक़े से बनाया गया है। इसके अतिरिक्त यहाँ सिखों का भी पवित्र स्थान है यहाँ पाँच प्यारों मे से एक भाई धर्मदास की जन्म स्थली है। हस्तिनापुर घूम कर बच्चे बहुत प्रसन्न हुए॥
दोपहर हो चुकी थी... वहाँ से बस से निकल कर हम मेरठ आए जहां सबके लिए भोजन की व्यवस्था थी। भोजन करने के बाद बच्चों को एक घंटे के लिए आराम करने का समय दिया गया। मेरठ मे प्रसिद्ध औघड़नाथ शिव मन्दिर जो आज़ादी की प्रथम लड़ाई का गवाह भी है के दर्शन करते हुए वापसी की
मेरठ मे बस खराब हो जाने के कारण दूसरी बस की व्यवस्था कर के हम तय समय से दो घंटे विलम्ब से गाजियाबाद आ गए और यात्रा की स्मृतियाँ सँजोए बच्चे अपने घर चले गए।
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